सड़क किसकी है- इंसान की, पशुओं की या लापरवाही की?
आलेख
- राजकुमार धर द्विवेदी वरिष्ठ पत्रकार रायपुर
रायपुर में एक सांड के हमले में करीब 15 लोगों के घायल होने की घटना ने एक बार फिर उस समस्या को हमारे सामने ला खड़ा किया है, जिसे हम वर्षों से देखते हुए भी अनदेखा करते आ रहे हैं। सड़क पर घूमते आवारा मवेशी हमारे शहरों और गांवों के लिए इतने सामान्य दृश्य बन चुके हैं कि अब हम उन्हें समस्या मानना ही छोड़ चुके हैं।
लेकिन जब कोई सांड अचानक किसी बुजुर्ग पर हमला करता है, जब कोई बच्चा उसकी चपेट में आता है, जब बाइक सवार मवेशी से टकराकर घायल होता है या जब रात के अंधेरे में हाईवे पर बैठे पशु किसी तेज रफ्तार वाहन की चपेट में आ जाते हैं, तब समझ में आता है कि यह सामान्य दृश्य नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा का प्रश्न है।
रायपुर की घटना में एक बुजुर्ग अपने एक वर्षीय पोते को गोद में लेकर घर के बाहर खड़े थे। अचानक सांड ने उन पर हमला कर दिया। सीसीटीवी में दर्ज यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकता है। घटना में कांग्रेस नेता कल्पना पटेल सहित करीब 15 लोग घायल हुए। सांड को पकड़ने के लिए नगर निगम की टीम को दिनभर प्रयास करना पड़ा और अंततः वन विभाग की सहायता से उसे ट्रैंक्विलाइजर देकर काबू किया गया।
यह घटना अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है- क्या हमें हर बार किसी हादसे के बाद ही जागना है?
दोष केवल पशु का नहीं
आक्रामक पशु से बचाव के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी है, लेकिन पूरी समस्या का दोष उस पशु पर डाल देना भी उचित नहीं होगा। एक सांड सड़क पर क्यों घूम रहा है? किसी पशुपालक का मवेशी सड़क पर क्यों पहुंचा? आवारा पशुओं को पकड़ने और सुरक्षित स्थान पर रखने की व्यवस्था कहां है? नगर निगम का पशु नियंत्रण दस्ता क्या कर रहा है?
कांजी हाउस, गौठान या अन्य निर्धारित स्थानों का उपयोग किस स्तर पर हो रहा है?
इन प्रश्नों के उत्तर खोजे बिना हम केवल एक सांड को पकड़कर यह मान लें कि समस्या समाप्त हो गई तो अगला हादसा केवल समय की बात होगी।
पशुपालकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं
पशु पालना केवल दूध या आर्थिक लाभ लेने का माध्यम नहीं है। पशु पालना एक जिम्मेदारी भी है।
यदि किसी व्यक्ति ने गाय, बैल या अन्य मवेशी पाल रखे हैं तो उसकी जिम्मेदारी है कि वह उन्हें खुला न छोड़े। सड़क, बाजार या सार्वजनिक स्थान पर छोड़ देना केवल प्रशासन के लिए परेशानी नहीं है, बल्कि दूसरे नागरिकों के जीवन को भी खतरे में डालना है।
कई बार पशुपालक सुबह पशुओं को सड़क पर छोड़ देते हैं और शाम को उन्हें वापस ले आते हैं। इस बीच पशु सब्जी मंडी, मुख्य बाजार, कॉलोनी और सड़कों पर भटकते रहते हैं। क्या यह उचित है? जिस पशु से पालक को आर्थिक लाभ मिलता है, उसकी सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी भी उसी की होनी चाहिए।
नगर निगम की जिम्मेदारी आखिर कहां से शुरू होती है?
दूसरी ओर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। शहर की सड़कों पर यदि लगातार मवेशी घूम रहे हैं, सब्जी मंडियों में पशु बैठे हैं, व्यस्त सड़कों पर झुंड दिखाई दे रहे हैं और शिकायतों के बावजूद स्थिति बनी हुई है तो केवल पशुपालकों को दोष देना पर्याप्त नहीं है। नगर निगम के पास पशु पकड़ने का दस्ता है। काउ कैचर हैं। निर्धारित स्थल हैं। पशु नियंत्रण के लिए कर्मचारी और संसाधन हैं।
फिर सवाल उठता है कि इन व्यवस्थाओं का नियमित और प्रभावी उपयोग क्यों नहीं दिखाई देता?
किसी बड़े हादसे के बाद टीम का सक्रिय होना जरूरी है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है कि ऐसी टीम सामान्य दिनों में भी सक्रिय रहे।
नगर निगम को केवल शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने के बजाय संवेदनशील और दुर्घटनाप्रवण क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए। बाजार, सब्जी मंडी, स्कूलों के आसपास, प्रमुख चौराहों और हाईवे से जुड़े मार्गों पर नियमित अभियान चलना चाहिए।
कांजी हाउस और गोठान केवल नाम के लिए नहीं
आवारा मवेशियों की समस्या का समाधान केवल उन्हें पकड़ना नहीं है। उन्हें रखने, उनकी देखभाल करने, बीमार पशुओं के उपचार और उनके स्वामित्व की पहचान की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
कांजी हाउस, गोठान अथवा पशु आश्रय जैसी व्यवस्थाएं तभी सार्थक हैं, जब वे वास्तव में कार्य कर रही हों।
जरूरत इस बात की है कि पकड़े गए पशुओं का रिकॉर्ड रखा जाए। मालिक की पहचान होने पर नियमों के अनुसार कार्रवाई हो। बार-बार पशु खुले छोड़ने वालों पर जिम्मेदारी तय हो। बीमार, घायल या आक्रामक पशुओं को सामान्य पशुओं से अलग रखा जाए। सिर्फ पशु पकड़कर कहीं छोड़ देना समस्या का समाधान नहीं है। इससे समस्या एक स्थान से दूसरे स्थान पर चली जाती है।
हाईवे पर बैठे मवेशी- एक मौन खतरा
शहरों की समस्या से भी अधिक गंभीर स्थिति राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर दिखाई देती है।
रात के समय सड़क पर बैठे मवेशी वाहन चालकों को अक्सर दूर से दिखाई नहीं देते। अचानक सामने आए पशु को बचाने की कोशिश में वाहन अनियंत्रित हो सकता है। कई बार चालक के पास बचने का समय ही नहीं होता। और दुर्भाग्य से, भारी वाहन की चपेट में आने पर पशु की जान भी जाती है और वाहन में बैठे लोगों की जिंदगी भी खतरे में पड़ती है।
कई ट्रक चालक अचानक सामने आए पशु को बचाने के बजाय सीधे वाहन निकालने की कोशिश करते हैं। परिणाम भयावह हो सकता है।
यहां प्रश्न केवल पशु-प्रेम का नहीं है। यह सड़क सुरक्षा का प्रश्न है। एक मवेशी की जान भी मूल्यवान है और वाहन में बैठे मनुष्य का जीवन भी। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि दोनों को अनावश्यक खतरे में न डालना पड़े।
जिम्मेदारी सबकी है
इस समस्या का समाधान किसी एक विभाग के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
पशुपालक अपने मवेशियों को खुला न छोड़ें।
नगर निगम नियमित रूप से आवारा पशुओं को पकड़ने और सुरक्षित स्थान पर रखने की व्यवस्था करे।
पशु चिकित्सा विभाग बीमार और आक्रामक पशुओं की पहचान एवं उपचार सुनिश्चित करे।
प्रशासन कांजी हाउस, गोठान और पशु आश्रय की व्यवस्था को प्रभावी बनाए।
पुलिस और यातायात विभाग दुर्घटनाप्रवण स्थानों पर आवश्यक समन्वय करें।
जनप्रतिनिधि आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर अपने क्षेत्रों में समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रशासन के साथ काम करें।
समाजसेवी और गौसेवक केवल पशुओं को बचाने तक सीमित न रहें, बल्कि पशुओं और नागरिकों दोनों की सुरक्षा के लिए प्रशासन के साथ मिलकर व्यवस्था बनाने में सहयोग करें।
और आम नागरिक भी पशुओं को सड़क पर चारा डालने जैसी आदतों पर विचार करें, क्योंकि इससे कई बार पशु उसी स्थान पर जमा होने लगते हैं और यातायात के लिए खतरा पैदा होता है।
राजनीति से बड़ा है नागरिक का जीवन
रायपुर की घटना के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आए हैं। यह लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। लेकिन जनता को केवल यह जानने में रुचि नहीं होनी चाहिए कि गलती किस पार्टी की है।
जनता का असली सवाल होना चाहिए-
समाधान कौन करेगा?
और उससे भी बड़ा सवाल-
अगली घटना रोकने के लिए अब क्या किया जाएगा?
किसी घटना के बाद एक-दूसरे पर आरोप लगाना आसान है। कठिन काम है, समस्या की जड़ तक जाना और ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें वही घटना दोबारा न हो।
पशु भी सुरक्षित रहें, इंसान भी
हमें यह समझना होगा कि पशु और मनुष्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सड़क पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है और न ही शहर की गलियां उनके स्थायी आश्रय हैं। उसी तरह मनुष्य को भी ऐसी सड़क नहीं मिलनी चाहिए, जहां अचानक कोई पशु उसकी जान के लिए खतरा बन जाए।
इसलिए समाधान पशुओं के प्रति क्रूरता नहीं, बल्कि जिम्मेदार पशु प्रबंधन है।
बीमार पशु का उपचार हो।आक्रामक पशु को अलग रखा जाए।आवारा पशुओं को सुरक्षित आश्रय मिले।पशुपालक अपने पशुओं की जिम्मेदारी लें।और प्रशासन अपनी व्यवस्था को कागज से निकालकर सड़क तक पहुंचाए।
सवाल एक सांड का नहीं, हमारी व्यवस्था का है
रायपुर में सांड ने 15 लोगों को घायल किया। लेकिन यदि हम केवल उस घटना पर चर्चा करके आगे बढ़ गए तो हमने इस घटना से कुछ नहीं सीखा।
अगला हादसा किसी दूसरे शहर में हो सकता है। किसी दूसरी सड़क पर हो सकता है। किसी हाईवे पर हो सकता है। किसी बच्चे, बुजुर्ग, बाइक सवार या वाहन चालक के साथ हो सकता है।
इसलिए आज जरूरत है कि हम इस प्रश्न को गंभीरता से पूछें-
सड़क आखिर किसकी है?
सड़क इंसान की भी है, पशु की भी है और समाज की साझा संपत्ति है। लेकिन सड़क को ऐसी जगह नहीं बनने दिया जा सकता, जहां मनुष्य और पशु दोनों असुरक्षित हों।
शहर की सड़कों पर घूमता हर मवेशी केवल एक पशु नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की एक परीक्षा है।
और हर दुर्घटना के बाद यह कहना कि "हादसा हो गया" पर्याप्त नहीं है।
जिम्मेदार समाज वह है, जो हादसे के बाद संवेदना व्यक्त करने के साथ-साथ अगला हादसा रोकने की व्यवस्था भी करता है।

