रेडियो श्रोता दिवस पर विशेष '’'''''''''''''''श्रोताओं के समर्पण और सम्मान का दिन है श्रोता दिवस

Ramesh agrawal
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रेडियो श्रोता दिवस पर विशेष 
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श्रोताओं के समर्पण और सम्मान का दिन है श्रोता दिवस 

बीसवीं सदी ने भारत में रेडियो प्रसारण सुनने वालों के मन में ज़बरदस्त कौतुहल पैदा किया, जिसके परिणामस्वरूप श्रोता रेडियो के कार्यक्रमों से जुड़ते चले गये. इतिहास के पन्नों पर 20 अगस्त का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है, इसी ऐतिहासिक तारीख़ को सन 1921 में पहली बार भारत में श्रोताओं के पत्रों को रेडियो पर प्रसारित किया गया. इसी ऐतिहासिक दिन की याद में छत्तीसगढ़ के श्रोताओं ने साल 2006 से हर साल इस तिथि को 'श्रोता दिवस' के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की. तब से लेकर आज तक प्रसारण की यह यात्रा बदस्तूर जारी है.

 आज से लगभग 20 साल पहले का एक दिन मुझे याद आता है जब मैं आकाशवाणी सागर में पदस्थ था. तब डॉक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग ने मुझे अपना शोध पत्र प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया था, जिसका विषय था-  वर्तमान संदर्भ में रेडियो की प्रासंगिकता. तब न तो यूनेस्को ने विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा की थी और ना ही 13 फरवरी का दिन मुकर्रर किया गया था, लेकिन रेडियो श्रोता दिवस मनाये जाने का दिन मेरे ज़ेहन में था. मैं पूरी तरह आश्वस्त था कि, श्रोताओं की भागीदारी के बिना रेडियो की प्रासंगिकता निरर्थक है. मेरी उम्र के लोगों और मुझसे बड़ों ने रेडियो का स्वर्णिम युग देखा है लेकिन जब मनोरंजन के अन्य माध्यमों यानी टेलीविजन और प्राइवेट चैनलों की बाढ़ सी आ गई, तब रेडियो के प्रति यह चिंता लाज़िमी थी. शुक्र है इसी बीच प्रसारण तकनीक में भी एक बड़ा बदलाव आया. पहले मीडियम वेव और शॉर्ट वेव पर प्रसारण होता था लेकिन बेहतरीन प्रसारण गुणवत्ता के साथ जैसे ही एफएम तकनीक आई वैसे ही रेडियो की दुनिया में भी क्रांति आ गई.  इसका प्रसारण दायरा हालांकि सीमित था लेकिन उच्च स्तरीय गुणवत्ता ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया.

वर्तमान में रेडियो प्रसारण एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है प्राइमरी चैनलों की बनिस्बत एफएम प्रसारण को ज़्यादा तरजीह दी जा रही है. जब तक सुधि श्रोता रेडियो के साथ है स्तरीय प्रसारण का क्षेत्र सुरक्षित रहेगा. सारे रेडियो कार्यक्रम श्रोताओं की मांग और सुझावों के आधार पर ही तैयार किए जाते हैं. रेडियो की पहुंच बहुसंख्य वर्ग तक है. भारत ही नहीं बल्कि विश्व की एक बड़ी आबादी शिक्षा और मनोरंजन के लिए रेडियो पर ही निर्भर है. 
यह एक शुभ संकेत है कि जन-जन की वाणी आकाशवाणी का अपने श्रोताओं से एक आत्मीय संबंध है. इसके श्रोता गांव में रहने वाले, खेत खलिहानों में काम करने वाले, सड़कों पर रिक्शा ठेला चलाने वाले, फैक्ट्री कारखाने में मज़दूरी करने वाले, बसों और ट्रैकों को चलाने वाले, दूरस्थ अंचलों में काम करने वाले समाजसेवक, स्कूलों कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं, पढ़ाने वाले अध्यापक सभी से रेडियो का सीधा नाता है. यानी अपने खून पसीने पर ज़िंदा रहने वाला कामकाजी वर्ग रेडियो को अपना सच्चा हमदर्द मानता है. यह आम आदमी ही रेडियो की सच्ची शक्ति है. आकाशवाणी ने जो अपना श्रोतावर्ग तैयार किया है उसके ऊंचे संस्कार हैं उसकी भाषा परिष्कृत है उसका चरित्र भी उच्चकोटि का है. आकाशवाणी का प्रसारण उसकी शिष्ठता और सरलता के कारण लोकप्रिय है. आकाशवाणी 'हींग्लिश' नहीं बोलती, यह इस्तेमाल करती है हिंदुस्तानी ज़बान का यानी हिंदी और उर्दू के मिश्रित शब्दों का. आकाशवाणी ही है जिसके प्रसारण में आँचलिकता का बहुतायत से समावेश है.

 आकाशवाणी रायपुर से जिस तरह छत्तीसगढ़ी में प्रसारण होता है, वैसे ही देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न भाषाओं और वहाँ की बोलियों में प्रसारण होता है. जिसे स्थानीय श्रोता बड़े चाव से सुनते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि आकाशवाणी के कार्यक्रमों में, उनकी प्रस्तुति में 'चाबुकदस्ती भी है और लफ्ज़लगामी भी'. 

आज जब हम प्रसारण के विभिन्न दायरों और उपलब्धियों पर बात कर रहे हैं, ऐसे में रेडियो प्रसारण के समक्ष चुनौतियों को भी हमें अब ध्यान में रखने की जरूरत है. यह सच है कि रेडियो संचारतंत्र का सरल सहज सीधा-सच्चा और अच्छा माध्यम है लेकिन इस बदलते दौर में रेडियो की लोकप्रियता को कायम रखने के लिए आज प्रसारण के समक्ष चुनौतियों को भी हमें स्वीकारना होगा. पारंपरिक फॉर्मेट जैसे नाटक, रूपक, परिचर्चा भेंटवार्ता, परिसंवाद आदि देश भर के आकाशवाणी केंद्रों से प्रसारित किये जाते हैं. दौड़ती भागती आधुनिक दुनिया में लंबी लंबी अवधि के कार्यक्रम अब बेमानी होते जा रहे हैं. श्रोता अब कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहते हैं. इसके लिए उनके पास इंटरनेट जैसा सशक्त माध्यम है.

 गुणवत्ता के आधार पर नई तकनीक का जिस तरह से विकास हुआ है उसके साथ-साथ ही आवश्यकता है कार्यक्रमों की पुनर्समीक्षा और उसके पुनः निर्धारण की. वैश्विक परिदृश्य में भी रेडियो फॉर्मेट और पारंपरिक विधाओं में तेजी के साथ नवाचार हो रहे हैं. इससे रेडियो प्रसारण की लोकप्रियता बढ़ रही है कड़ी  प्रतिस्पर्धा के बावजूद. कहने का तात्पर्य यह है कि बहुसंख्यक श्रोतावर्ग को अपने साथ जोड़े रखने के लिए आज ज़रूरत है श्रोताओं के सुझावों का पूरा-पूरा ध्यान रखकर रेडियो प्रसारण के समक्ष चुनौतियों को भी शिष्टता से स्वीकार करते हुए आवश्यक बदलाव करने की. तभी आकाशवाणी के उपलब्धिपूर्ण नब्बे सालों का जश्न सार्थक होगा.
                -प्रकाश उदय 
               वरिष्ठ उद्घोषक 
        आकाशवाणी रायपुर (छत्तीसगढ़)

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