मीना बाजार: को लेकर हर बार उठते हैं, सवाल पुराने, शिकायतें पुरानी, फिर भी हर साल लग जाता है मेला ?

Ramesh agrawal
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अभिषेक उपाध्याय रायगढ
मनमाना बाजार के सामने सब हो जाते हैं नतमस्तक
शहर में मीना बाजार का नाम आते ही अब झूले, रोशनी और परिवार के साथ बिताए जाने वाले खुशनुमा पल याद नहीं आते। याद आता है विरोध, अनुमति, विवाद, कोर्ट-कचहरी और फिर कुछ दिनों बाद उसी जगह पर सजता हुआ मीना बाजार। हर साल कहानी लगभग वही होती है। सवाल उठते हैं, आपत्तियां सामने आती हैं, व्यवस्थाओं को लेकर बहस होती है और फिर धीरे-धीरे सब शांत पड़ जाता है। आखिरकार मेला लग जाता है और अगले करीब 40 दिनों तक शहर में एक ऐसा कारोबार चलता है, जिसमें भीड़ आम आदमी की होती है और कमाई आयोजकों की। इस कथित मीना बाजार से जुड़े आयोजन में कई गुंडों की भी मौज होने की बातें सामने आती रही हैं। 40 दिन तक मुफ्त में खाना-पीना और गुंडई करना—यह आरोप अगर सही हैं तो इससे बड़ा सवाल प्रशासनिक व्यवस्था पर और क्या हो सकता है?
बीते साल भी मीना बाजार में झूले को लेकर लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा था। उससे एक साल पहले हाई कोर्ट के आदेश को लेकर भी विवाद सामने आया था। यानी लगातार कुछ वर्षों से आयोजन किसी न किसी वजह से सवालों के घेरे में रहा है। इसके बावजूद हर बार व्यवस्था में स्थायी सुधार के बजाय आयोजन के बाद विवाद पर चर्चा होती है और अगली बार फिर वही प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
क्योंकि बाजार के नाम पर सबका हिस्सा फिक्स होने की चर्चाएं भी हैं। विरोध जितना बड़ा, पैकेज उतना बड़ा—ऐसी बातें शहर में होती रहती हैं। कमाई करोड़ों में होने की चर्चा है और हर किसी की नजर इस पर रहती है। सवाल यह है कि आखिर इस पूरे कारोबार में आम आदमी के हित और प्रशासनिक जवाबदेही की जगह कहां है? त्योहारों का समय इस कारोबार के लिए सबसे मुफीद है। जन्माष्टमी और रक्षाबंधन जैसे त्योहारों के आसपास बाजार में स्वाभाविक रूप से भीड़ बढ़ती है। परिवार बाहर निकलते हैं, बच्चे झूले और खेलों की जिद करते हैं और इसी भीड़ को मीना बाजार अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेता है। प्रवेश शुल्क दीजिए, पार्किंग का पैसा दीजिए, झूले के लिए अलग टिकट लीजिए और फिर खाने-पीने की दुकानों पर अपनी जेब के हिसाब से नहीं, दुकानदार के हिसाब से कीमत चुकाइए। सवाल यह नहीं कि पैसा क्यों लिया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या उसके बदले आम आदमी को उचित सुविधा, सुरक्षा और गुणवत्ता भी मिल रही है?

झूलों की सुरक्षा पर उठते सवाल 

सबसे गंभीर सवाल झूलों की सुरक्षा का है। बीते साल झूले को लेकर लोगों को परेशानी हुई, तो इस साल क्या बदला? क्या सभी झूलों की तकनीकी जांच हुई है? क्या उनकी फिटनेस रिपोर्ट उपलब्ध है? कौन अधिकारी यह प्रमाणित कर रहा है कि झूले पूरी तरह सुरक्षित हैं? और अगर कोई दुर्घटना होती है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मेले में आने वालों में बड़ी संख्या बच्चों और परिवारों की होती है। मनोरंजन के नाम पर लगने वाला कोई भी आयोजन सुरक्षा के मामले में समझौते की गुंजाइश नहीं रखता।
खान-पान भी दूसरा बड़ा सवाल है। महंगे खाने की शिकायत कोई नई बात नहीं है। कीमतें बाजार से कई गुना ज्यादा और गुणवत्ता को लेकर भी सवाल। लेकिन त्योहार के माहौल में परिवार के साथ आए व्यक्ति के पास विकल्प कितना होता है? बच्चा खाने की जिद करेगा तो अभिभावक कीमत देखकर भी खरीदेंगे ही। यही इस पूरे कारोबार का गणित है भीड़ मजबूरी है और मजबूरी ही बाजार की सबसे बड़ी ताकत।

बाजार की फिजा में दबंगई घुली

और फिर आता है पार्किंग और प्रवेश का सवाल। हजारों लोगों की आवाजाही वाले आयोजन में पार्किंग के नाम पर वसूली होती है, प्रवेश के नाम पर वसूली होती है और अंदर लगभग हर गतिविधि के लिए अलग भुगतान करना पड़ता है। ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि शुल्क की दरें कौन तय करता है और इसकी निगरानी किस स्तर पर होती है।
शहर में आम आदमी खुलकर सवाल उठाने से भी कई बार बचता है। बड़े आयोजनों के साथ निजी सुरक्षा और दबंगई की शिकायतों की चर्चा भी होती रहती है। ऐसे में प्रशासन के सामने सवाल है कि क्या कोई ऐसा प्रभावी तंत्र है, जहां आम नागरिक बिना किसी दबाव के शिकायत कर सके और उसकी शिकायत पर तत्काल कार्रवाई हो?
कभी मीना बाजार परिवार के लिए मनोरंजन का पर्याय था। बच्चे झूले देखते ही खुश हो जाते थे। माता-पिता परिवार के साथ कुछ घंटे बिताते थे। थोड़ा खाते थे, थोड़ा खरीदते थे और लौटते वक्त मेले की यादें साथ लेकर जाते थे।
अब शहर का एक वर्ग ऐसे आयोजनों से दूरी बनाने लगा है। वजह साफ है—भीड़, महंगाई, अव्यवस्था, पार्किंग की परेशानी और सुरक्षा को लेकर सवाल।
लेकिन बाजार फिर भी चलता है। क्योंकि आयोजकों को पता है कि जाने वालों की संख्या इतनी है कि न जाने वालों की नाराजगी से कारोबार पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।
यही सबसे बड़ा सवाल है।

अव्यवस्था का जिम्मेदार कौन?

अगर पूर्व के वर्षों में आयोजन को लेकर विवाद सामने आए हैं, एक साल झूले की व्यवस्था को लेकर लोगों को परेशानी हुई, फिर यातायात बाधित हुआ और उससे पहले हाई कोर्ट के आदेश में यथास्थिति को लेकर सवाल उठे—तो प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस बार पुरानी शिकायतें दोहराई न जाएं। क्या इस बार सभी झूलों की तकनीकी जांच की गई है?
क्या हाई कोर्ट से जुड़े पुराने विवाद के बाद नियमों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया गया है?
क्या पार्किंग और प्रवेश शुल्क की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक है? क्या खाद्य दुकानों की नियमित जांच होगी? क्या भीड़ और यातायात प्रबंधन की ठोस व्यवस्था है? और सबसे महत्वपूर्ण—अगर इस बार भी कोई अव्यवस्था होती है तो जवाबदेही किसकी होगी?
मीना बाजार लगे, इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। शहर को मनोरंजन चाहिए, बच्चों को खुशियां चाहिए और कारोबारियों को व्यापार का अवसर भी मिलना चाहिए। लेकिन मेले के नाम पर अगर नियम पीछे और कमाई आगे हो जाए, तो सवाल उठेंगे ही। क्योंकि शहर को मीना बाजार चाहिए, मनमाना बाजार नहीं। और प्रशासन को यह तय करना होगा कि इस बार फिर वही पटकथा न दोहराई जाए—विरोध हो, विवाद हो, कोर्ट-कचहरी हो… और अंत में मेला फिर लग ही जाए।

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