दिल्ली के राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ का सम्मान:-रायगढ की मोनिका इजरदार ने राहूल गांधी के साथ मंच किया साझा !

Ramesh agrawal
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दिल्ली के राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ का सम्मान  
कभी-कभी किसी व्यक्ति को मंच मिलना सिर्फ उस व्यक्ति का सम्मान नहीं होता, बल्कि उसके साथ पूरे प्रदेश की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच मिलना होता है।

दिल्ली में आयोजित रचनात्मक कांग्रेस के दो दिवसीय समस्या समाधान एवं सुझाव संवाद में देशभर से 3000 से अधिक लोग अलग-अलग क्षेत्रों, विचारधाराओं और सामाजिक सरोकारों के साथ एकत्रित हुए।
कला, साहित्य, शिक्षाविद, NGO कार्यकर्ता, दलित एवं आदिवासी मुद्दों पर काम करने वाले लोग, जल-जंगल-जमीन के आंदोलनकारी, महिला एवं बाल अधिकार कार्यकर्ता, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण से जुड़े लोग, पूर्व IAS-IPS अधिकारी, BSF, Air Force, Aviation, IPTA, रंगमंच, फिल्म, लेखन, कविता, कॉमेडी, गायन और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हजारों लोग वहाँ मौजूद थे।
और इस विशाल राष्ट्रीय मंच पर रायगढ़ और छग उद्दिशा के लिए जयंत बहिदार जी को इस संवाद में अपनी बात रखने का अवसर मिला।
आदि बाबा के सुझाव और पहल से रायगढ़ की आवाज़ दिल्ली तक पहुँची।

और इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनीं मोनिका इजारदार जी।

3000 से अधिक लोगों के बीच राहुल गांधी जी के ठीक बगल में रायगढ़ की मोनिका जी

मोनिका इजारदार जी पिछले लगभग 14 वर्षों से महिलाओं के मासिक धर्म, पीरियड्स और menstrual hygiene जैसे विषयों पर काम कर रही हैं।

लेकिन इस बार उन्होंने केवल रायगढ़ या छत्तीसगढ़ की बात नहीं रखी।

उन्होंने उस राष्ट्रीय मंच पर भारत की महिलाओं से जुड़े उस विषय को आवाज़ दी, जिस पर आज भी समाज खुलकर बात करने से झिझकता है।

और सबसे खास बात—

हजारों लोगों की मौजूदगी के बीच मंच पर केवल तीन लोगों को राहुल गांधी जी के साथ बैठने का अवसर मिला।

उन तीन लोगों में से एक थीं—

रायगढ़ की मोनिका इजारदार जी।

वह सिर्फ मंच साझा नहीं कर रही थीं।

वह राहुल गांधी जी के ठीक बगल में बैठी थीं।

एक तरफ देश के प्रमुख विपक्षी नेता राहुल गांधी जी और दूसरी तरफ रायगढ़ की एक सामाजिक कार्यकर्ता, जिसने पिछले 14 वर्षों से महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े मुद्दों को अपनी सामाजिक लड़ाई बनाया है।

यह दृश्य मेरे लिए सिर्फ रायगढ़ नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय है।

और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था कि मोनिका जी को सिर्फ बैठने का स्थान नहीं मिला, उनकी बात को सम्मान के साथ सुना गया।
“हर कोई यहाँ जाति-धर्म की बात करता है…”

मोनिका जी ने राहुल गांधी जी के सामने बैठे उस मंच से एक ऐसी बात कही, जो सीधे सोचने पर मजबूर करती है।

उन्होंने कहा—

“हर कोई यहाँ जाति और धर्म की बात करता है, लेकिन हम सबका एक धर्म है—मासिक धर्म।”

और फिर उन्होंने कहा—

“अगर ये नहीं होता, तो शायद तुम नहीं होते, हम नहीं होते, कोई नहीं होता।”

सोचिए…

जिस विषय पर हमारे समाज में आज भी लोग खुलकर बात करने से कतराते हैं, उसी विषय पर रायगढ़ की एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता हजारों लोगों के सामने, देश के इतने बड़े मंच पर, बिना झिझक अपनी बात रख रही थीं।

और सामने बैठे राहुल गांधी जी उनकी बात को सुन रहे थे।

यही तो लोकतांत्रिक संवाद है।

किसी की बात से सहमत होना जरूरी नहीं।

लेकिन उसे बोलने का अवसर देना जरूरी है।

और मेरे लिए यही आदि बाबा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि छत्तीसगढ़ की एक ऐसी महिला की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच मिला, जो वर्षों से समाज के एक बेहद जरूरी लेकिन उपेक्षित विषय पर काम कर रही है।

आदि बाबा को छत्तीसगढ़ की ओर से दिल से धन्यवाद। 

आपने केवल मोनिका जी को दिल्ली नहीं पहुँचाया—

आपने छत्तीसगढ़ की एक बेटी की आवाज़ को देश के सामने पहुँचाया।

श्याम भाऊ देवकर जी — कला किसी सत्ता की कठपुतली नहीं

IPTA से जुड़े श्याम भाऊ देवकर जी ने कला और संस्कृति से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया।

कला पर सत्ता या सरकार की मोनोपॉली, अपने पसंदीदा लोगों को आगे करना और कलाकारों को राजनीतिक नज़दीकियों के आधार पर जगह देना—यह कला को मजबूत नहीं, कमजोर करता है।

कला का दलगत राजनीतिकरण किसी भी सरकार या पार्टी को नहीं करना चाहिए।

NSD हो, संगीत हो, चित्रकला हो, रंगमंच हो, पद्मश्री हो या देश के किसी बड़े सांस्कृतिक संस्थान में स्थान—वहाँ किसी दल के करीबी नहीं, देश की प्रतिभाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

देश के कलाकार किसी पार्टी के नहीं होते।

कलाकार देश के होते हैं।

हमें ऐसे लोगों को आगे लाना चाहिए जो अपने काम से देश के करीब हैं, न कि सिर्फ सत्ता के करीब।


जयंत बहिदार जी — सवाल सबके लिए

वरिष्ठ एक्टिविस्ट जयंत बहिदार जी ने अपने उसी बेबाक और आक्रामक अंदाज में अडानी, जिंदल और महानदी से जुड़े सवालों को उठाया।

साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनता के सवालों की लड़ाई में कांग्रेस का सहयोग भी जरूरी है—जैसे देश में, वैसे प्रदेश में भी।

और यहाँ एक बात साफ होनी चाहिए—

आलोचना सबकी होगी।

अगर हम सिर्फ दूसरे की गलती देखेंगे और अपने लोगों की गलती पर चुप रहेंगे, तो फिर हमारी लड़ाई विचार की नहीं, सिर्फ दल की रह जाएगी।

जनता के सवाल पर सत्ता किसी की भी हो—
सवाल होना चाहिए।


वहाँ सिर्फ नेता नहीं, अपने-अपने मोर्चे पर लड़ रहे लोग थे इस पूरे संवाद की सबसे खूबसूरत बात यही थी।

कोई North-East में अपने लोगों और अधिकारों के लिए लड़ रहा था।

कोई अंडमान में जंगल, पेड़-पौधों और पर्यावरण के लिए संघर्ष कर रहा था।

कोई दवाओं की अवैध बिक्री के खिलाफ लड़ रहा था।

कोई रेलवे से जुड़े सवाल उठा रहा था।

कोई NGT के माध्यम से पर्यावरण की लड़ाई लड़ रहा था।

कोई महिला अधिकारों के लिए।

कोई जल-जंगल-जमीन के लिए।

किसी की लड़ाई अलग थी, किसी का मुद्दा अलग था—

लेकिन सबके अंदर एक बात समान थी—

अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत।

और अंत में राहुल गांधी जी की सबसे महत्वपूर्ण बात

कार्यक्रम के अंत में राहुल गांधी जी ने कहा—

अपने हक़ के लिए लड़ते रहिए।
चाहे सरकार हमारी हो या किसी और की।

मेरे लिए यह बात बहुत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि हक़ के लिए लड़ने वाला किसी दल का नहीं होता।

वह जनता का होता है।

और मेरी भी यही सोच है—

कट्टरता किसी की भी हो, सही नहीं है।

RSS से जुड़ा कोई व्यक्ति अगर किसी सही मुद्दे पर लड़ रहा है, तो उसके सही काम के लिए भी मैं खड़ा होऊँगा।
और अगर मेरे अपने लोग गलत करेंगे, तो गलत को गलत कहूँगा।

मेरी लड़ाई विचार से है, इंसान से नहीं।

न धर्म से।

न जाति से।

न किसी की पहचान से।

न किसी संगठन से जुड़े होने मात्र से।

मैं किसी के विचार का विरोध कर सकता हूँ—

लेकिन इंसान से नफरत नहीं कर सकता।

अगर कोई बात गलत लगे तो उसे प्यार से समझाइए।

बात का जवाब बात से।
तर्क का जवाब तर्क से।
असहमति का जवाब संवाद से।

यही भारत है।

और शायद दिल्ली के इस दो दिवसीय संवाद ने इसी भारत की एक खूबसूरत तस्वीर दिखाई—

हजारों लोग, हजारों विचार, हजारों संघर्ष—लेकिन एक जगह बैठकर एक-दूसरे को सुनने की कोशिश।

इस पूरे अवसर के लिए रचनात्मक कांग्रेस के छत्तीसगढ़ प्रदेश संयोजक आदित्येश्वर शरण सिंहदेव ‘आदि बाबा’ को रायगढ़ और छत्तीसगढ़ की ओर से दिल से धन्यवाद।
मोनिका इजारदार जी, श्याम भाऊ देवकर जी और जयंत बहिदार जी को भी सलाम—आपने दिल्ली जाकर सिर्फ अपनी बात नहीं रखी,
आपने रायगढ़ और छत्तीसगढ़ की जमीनी आवाज़ को राष्ट्रीय संवाद का हिस्सा बनाया।

रायगढ़ का सम्मान।

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